माँ | Hindi Class 10th Subjective Question 2022 | Bihar Board Class 10th Hindi Subjective Question 2022 |

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                                     माँ (ईश्वर पेटलीकर)

लेखक-परिचय-  ईश्वर पेटलीकर गुजराती भाषा के अति लोकप्रिय कथाकार हैं। इन्होंने अपने कथा साहित्य में गुजरात के सामाजिक, दार्शनिक, कला तथा नए. पुराने मूल्यों को उद्घाटित किया है। इनकी प्रसिद्ध कहानी ‘खून की सगाई’ तथा इनका लोकप्रिय उपन्यास ‘कालापानी’ है। श्री पेटलीकर साहित्य के अतिरिक्त सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में भी सक्रिय रहे हैं। इनकी दर्जनों पुस्तके पुरस्कृत तथा प्रशंसित हो चुकी हैं। प्रस्तुत कहानी गोपाल दास नागर संपादित एवं अनूदित कहानी संग्रह ‘माँ’ से साभार संकलित है।

प्रश्न 1. मंगु के प्रति माँ और परिवार के अन्य सदस्यों के व्यवहार में जो फर्क हैउसे अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर- मंगु के प्रति माँ का सहज व्यवहार था। वह उसे बोझ न मानकर, माँ का कर्तव्य समझकर उसकी सेवा करती थीं। यदि कोई उसे पागलों के अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह देता तो उनका हृदय कराह उठता  वह कहती कि “मै माँ होकर सेवा नहीं कर सकती, तो अस्पताल वालों को क्या पड़ी है ? अपंग जानवर की गौशालाओं में भर्ती कर आने जैसा ही यह कहा जाएगा।” तात्पर्य यह कि माँ मंगु की विवशता के कारण उसे अपने से अलग करना नहीं चाहती थी। वह जिस तरह से उसकी सेवा लाड़-प्यार से करती थी, उसे देखकर लोग दंग रह जाते थे लोग स्वयं स्वीकार कर लते कि इस तरह की पागल पुत्री को माँ ही पाल सकती है, दूसरे घर में तो वह भूखी-प्यासी कब की मर गई होती। यदि जीवित भी होती तो शरीर स्वस्थ नहीं रहता। यानी, माँ मंगु को पूर्ण मातृभाव से सेवा करती थी। माँ को मंगु के अलावे तीन संतान और थीं, दो पुत्र तथा एक पुत्री । दोनों पुत्र पढ़- लिखकर शहर में नौकरी करते थे तथा पुत्री ससुराल चली गई थी। घर पोता-पोतियों से भरा हुआ था। लेकिन माँ मंगु की सेवा पूरी तल्लीनता से करती थी। बहुएँ उनके इस आचरण से दुःखी रहती थीं। वे चाहती थीं कि मंगु को पागल-अस्पताल में भर्ती कराकर मुक्त हो जाएँ। विवाहिता पुत्री भी माँ को सदा कोसती रहती थीं। तात्पर्य यह कि घर के अन्य सदस्य मंगु को परिवार का बोझ मानकर खिन्न रहते थे और उससे छुटकारा पाने के लिये व्यग्र रहते थे।

प्रश्न  2.माँ मंगु को अस्तपाल में क्यों नहीं भर्ती कराना चाहती?

उत्तर– माँ अस्पताल को गौशाला की उपमा देती थी। उनका मानना था कि जब माँ होकर वह अपनी संतान की सेवा नहीं कर सकती है तो अस्पताल वालों को क्या पड़ी है ? मंगु जन्म से ही पागल एवं गूंगी थी। उसे न तो पेशाब-पाखाना कहाँ करना है और कहाँ न करना है, का ख्याल रहता था और न कपड़े आदि का ही। रात भर माँ उस पर ध्यान रखती थी। पेशाब करने पर वस्त्र बदल देती थी, ओढ़ना हटाने पर पुनः ओढ़ा देती थी। अपने हाथों से मंगु के मुँह में भोजन डालती थी। यानी मंगु का सारा काम माँ स्वयं करती थीं। इसीलिए उन्हें लगता था कि अस्पताल में इस प्रकार कौन देखभाल करेगा? निःस्वार्थ भाव से एक माँ ही अपनी संतान की विवशता का ख्याल रख सकती है। इसी कारण वह हर सलाह देने वालों को यह कहकर टाल देती थी कि अपनी संतान की सेवा न करके अस्पताल में भर्ती कराना अपंग जानवरों की गौशालाओं में भर्ती कर आने जैसा ही होगा। इन्हीं कारणों से वह मंगु को अस्पताल में भर्ती कराना नहीं चाहती थी।

प्रश्न 3. कुसुम के पागलपन में सुधार देख मंगु के प्रति माँपरिवार और समाज की प्रतिक्रिया को अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर– कुसुम के पागलपन में सुधार देख हर कोई मंगु को अस्पातल में भर्ती करने की सलाह माँ को देने लगा। वह लोगों की बातों का विरोध किए बिना चुपचाप उनकी सलाह सुनती रहीं, जो पहले ऐसी सलाह पर हर एक को यही जवाब देती कि “मैं माँ होकर सेवा नहीं कर सकती तो अस्पताल वालों को क्या पड़ा है ? यह तो अपंग जानवरों को गौशालाओं में भर्ती कराने जैसा ही होगा। लेकिन कुसुम की सुधरी हुई स्थिति देख उनका विचार बदल जाता है और कुसुमं को अपने घर बुलाकर अस्पताल की जानकारी लेती है। कुसुम की बातों से अस्पताल के प्रति उनके मन में पड़ी गाँठ खुल जाती है तथा अस्पताल के प्रति श्रद्धाभाव का संचरण होता है। मन में नई आशा पैदा होती है कि मंगु के भाग्य में दवाखाने जाने से पागलपन मिटने का लिखा होगा, यह किसे पता । यह सोच बड़े पुत्र को पत्र भेजकर बुलाती हैं  साथ ही, परिवार वालों की मंगु के प्रति उदासीनता देख अस्पताल में भर्ती कराने का निश्चय करती है, क्योंकि उनकी अवस्था बढ़ती जा रही थी। इस स्थिति में मंगु का भगवान साथी हो, उसका पागलपन मिटे या न मिटे, तो भी उसे अस्पताल में भर्ती कराना ही उचित है, क्योंकि माँ के सिवा परिवार में उसकी चाकरी करने वाला कोई नहीं था। इसलिए उसकी चाकरी करने वाला दुनिया में पराया ही कोई है तो सही।

प्रश्न 4.कहानीके शीर्षक की सार्थकता पर विचार करें।

उत्तर— ‘माँ’ कहानी का शीर्षक कथा-वस्तु या कहानी के आधार पर ‘माँ’ रखा गया है। कहानी माँ के ही चारों ओर घूमती है। माँ इस कहानी की मुख्य पात्र हैं। उनकी सबसे छोटी संतान मंगु जन्म की पागल तथा गूंगी है। उसकी देख-रेख अथवा सेवा माँ करती है। परिवार के अन्य सदस्यदो बड़े पुत्र, उनकी पत्नियाँ तथा विवाहिता पुत्री आदि सभी मंगु को अस्पताल में भर्ती कराने के पक्ष में हैं, हर कोई उसे परिवार का बोझ मानते हैं, सिर्फ माँ ही उसकी सेवा में लगी होती है। कहानीकार ने एक माँ की हार्दिक ममत्व को प्रकट कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि माँ की ममता उस संतान के प्रति अधिक होती है, जो असहाय होता है। उसकी खुशी के लिए माँ दिन-रात बेचैन रहती है। यह नहीं चाहती है कि उसकी कोई संतान दुःखी रहे। इसीलिए कहानी के आरंभ से अंत तक माँ छाई रहती है। मंगु के साथ माँ की निःस्वार्थ सेवा एवं आत्मीयता देख पुत्र, पड़ोसी, डॉक्टर तथा नर्स अचंभित रह जाते हैं। कहानी तीव्रगति से बढ़ती हुई चरमावस्था पर तब पहुँच जाती है जब माँ भी पगली पुत्री के वियोग में पुत्री की श्रेणी में पहुँच जाती है। कहानीकार अपने उद्देश्य की प्राप्ति पूर्ण सफलता के साथ कर लेता है। कहानी का शीर्षक ‘माँ’ पूर्णतः सार्थक है, क्योंकि एक माँ अपनी संतान की खुशी के लिए क्या कर सकती है? उसका प्रतिपादन पूर्ण सफलता के साथ हुआ।

प्रश्न 5. मंगु जिस अस्पातल में भर्ती की जाती हैउस अस्पताल के कर्मचारी व्यवहारकुशल हैं या संवदेनशील? विचार करें।

उत्तर— मंगु जिस अस्पताल में भर्ती की जाती है, उस अस्पताल के कर्मचारी संवदेनशील हैं। उसका पता तब चलता है, जब मंगु अस्पताल में अन्दर जा रही थी  सिर पर हाथ रख, माँ रोज की भाँति स्नेहमय ‘बेटा’ शब्द उच्चारित करने लगीं कि तभी उनका स्वर फूट पड़ा, मरने के समय जैसी एक लंबी सिसकी फूट पड़ी। इस आक्रंदन में सारा अस्पताल डूब गया। सारे कर्मचारियों के हृदय भर गए, दीवारें आद्र हो उठीं। इतना स्नेह भरा किसी पागल का स्वजन वहाँ किसी ने नहीं देखा था। डॉक्टर ने आश्वासन भरे शब्दों कहा “माँ जी, बेटी को अस्पताल में नहीं, बेटे के घर छोड़े जा रही हैं, ऐसा मानिएगा। माँ जी का ममतामयी रूप देखकर मेट्रन की शक्ति लुप्त हो गई। अस्पताल के सारे लोग माँ की करुणा की धारा में बहकर संवेदनशील हो जाते हैं।

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