अर्थव्यवस्था और आजीविका

अर्थव्यवस्था और आजीविका vvi question 2022 | Class 10th vvi Subjective Question 2022

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पाठ के मुख्य बात (सारांश)

अर्थव्यवस्था और आजीविका:- औद्योगीकरण से पहले इंगलैंड भी एक कृषि प्रधान देश ही था। लेकिन औद्योगिक क्रांति के सफल हो जाने से वहाँ के ग्रामीण उद्योग धंधे बर्बाद हो गए और ग्रामीण शहरों में एकत्र होकर कारखानों में काम करने लगे। इंग्लैंड में औद्योगीकरण का कारण था। कि वहाँ कुछ ऐसे यंत्रों के आविष्कार हुए जिनसे उत्पादन सस्ता और सुन्दर होने लगा । अब समस्या थी कि इन तैयार मालो को बेंचा कहाँ जाय ।

         इसके लिए उपनिवेशों को बढ़ाने और उन पर अधिकाधिक अंकुश रखा जाने लगा। वहाँ उन्हें केवल बाजार ही नहीं मिले, बल्कि कच्चे माल भी मिलने लगे। वे नाम मात्र के मूल्य या खर्च पर कच्चा माल लाते और उसी से मोल तैयार कर उन्हीं देशों में बेचने लगे। इससे केवल इंग्लैंड ही नहीं लगभग यूरोप के सभी देश धन-धान्य से पूर्ण रहने लगे। कच्चे माल की प्राप्ति तथा तैयार माल के बाजार के लिए उनमें प्रतिद्वन्द्विता भी बढ़ने लगी।राष्ट्रवादिता के उदय के फलस्वरूप भारत में भी फैक्टिरियों की स्थापना होने लगी।

             सर्वप्रथम 1830-40 के दशक के मध्य बंगाल में द्वारका नाथ टैगोर ने 6 संयुक्त उद्यम कम्पनियाँ स्थापित करने में सफलता पाई। सूती कपड़े का पहला कारखाना 1851 में बम्बई में स्थापित हुआ । धागा कातने का पहला कारखाना बम्बई में ही 1954 में लगा। इसके बाद लगातार सूती वस्त्र के कारखाने बढ़ते ही गए जो 1914 तक इनकी संख्या 144 तक हो गई।

          जूट मिलों की स्थापना 1917 में कलकत्ता में हुई। 1907 में जमशेद जी नशरवान जी टाटा ने साकची नामक स्थान पर लोहे का कारखाना खोला और जमशेटुपर नगर बसाया। 1955 तक स्टील प्लाटों की संख्या 7 हो गई, जिनमें कुछ तो सार्वजनिक क्षेत्र के हैं और कुछ निजी क्षेत्र के अंग्रेजों ने ही भारत में चाय तथा कॉफी के बगान लगवाए।

             यह भी औद्योगीकरण की ही देन थी। भारत में भी अब उद्योगों का तांता लग गया। परिणाम हुआ कि नगरों का विकास हुआ लेकिन कुटीर उद्योग नष्ट हो गये। समाज में वर्ग विभाजन भी तेजी से फैला। पहले जहाँ मजदूर केवल खेतों में ही काम करते थे, अब कारखानों में भी काम करने लगे। एक स्थान पर मजदूरों के एकत्र होने से स्लम पद्धति की शुरुआत हुई।

           झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ने लगी। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कुटीर उद्योगों की उन्नति की ओर अधिक ध्यान दिया गया। हालाँकि गाँधीजी के प्रयत्न से कांग्रेस पहले से ही कुटीर उद्योगों के विकास का प्रयत्न कर रही थी।

अर्थव्यवस्था और आजीविका Class 10th  vvi Subjective Question 2022

प्रश्न 1. फैक्ट्री प्रणाली के विकास के किन्हीं दो कारणों को बतायें।

उत्तर : फैक्ट्री प्रणाली के विकास के प्रमुख दो कारण निम्नलिखित थे :-

(i) नये-नये यंत्रों का आविष्कार तथा

(ii) गाँवों में गृह उद्योग की समाप्ति, जिससे

शहरों में सस्ते श्रम की प्राप्ति।

प्रश्न 2. बुर्जुआ वर्ग की उत्पत्ति कैसे हुई?

उत्तर- औद्योगीकरण के सफल होने के फलस्वरूप समाज में स्पष्टतः तीन वर्ग हो गए :

(i) पूँजीपति वर्ग,  

(ii) बुर्जुआ वर्ग तथा

(iii) मजदूर वर्ग। बीच का बुर्जुआ वर्ग ही मध्य वर्ग था, जिसके हाथ में व्यापार की कुंजी थी।

प्रश्न 3. अठारहवीं शताब्दी में भारत के मुख्य उद्योग कौन-से थे?

उत्तर- अठारहवीं शताब्दी में भारत में वे सारी वस्तुएँ बनती थीं, जो मनुष्यों द्वारा उपयोग किया जाता है। भले ही ये उद्योग गृह उद्योग में चलते थे। जैसे : कपड़ा उद्योग, कम्बल उद्योग, गुड़ उद्योग, तम्बाकू उद्योग आदि ।

प्रश्न 4. निरुद्योगीकरण से आपका क्या तात्पर्य है?

उत्तर- निरूद्योगीकरण से मेरा तात्पर्य है उद्योगों का अभाव। ब्रिटेन में औद्योगीकरण की सफलता ने भारत को उद्योगों से पूर्णतः महरूम कर दिया। इसी को निरूद्योगीकरण कहा जाता है।

5. औद्योगिक आयोग की नियुक्ति कब हुई? इसके क्या उद्देश्य थे?

उत्तर:- औद्योगिक आयोग की नियुक्ति 1916 में हुई। इस आयोग का उद्देश्य था कि वह भारतीय उद्योग और व्यापार के भारतीय वित्त से सम्बंधित प्रयत्नों के लिए उन क्षेत्रों का पता लगाया जाय, जिसे सरकार सहायता दे सके।

अर्थव्यवस्था और आजीविका Bihar Board Social Science vvi Subjective Question 2022

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1. औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- औद्योगीकरण उस औद्योगिक क्रांति को कहते हैं, जिसमें वस्तुओं का उत्पादन मानव श्रम के द्वारा न होकर मशीनों के द्वारा होता है। औद्योगीकरण में उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।

           बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन होने के कारण उनकी बिक्री के लिए बाजार की आवश्यकता पड़ती है। उत्पादित माल आसानी से बाजारों तक पहुँचाया जा सके. इसके लिए अच्छी सड़कों तथा रेलों की व्यवस्था आवश्यक है। इन माध्यमों से कारखानों तक कच्चा माल भी पहुँचाया जाता है।

2. औद्योगीकरण ने मजदूरों की आजीविका को किस तरह प्रभावित किया?

उत्तर- औद्योगीकरण ने मजदूरों की आजीविका को इस तरह प्रभावित किया कि उन्हें पता भी नहीं चला और वे ग्रामीण स्वर्ग के क्षेत्र के स्थान पर शहरीय स्लम जैसे नारकीय जीवन में फँसने को मजबूर हो गए।

         शहरों में या जहाँ भी कारखाना लगाए गए वहाँ के विषय में ऐसा प्रचार किया गया, मानों मजदूरों को वहाँ आरामदायक जीवन व्यतीत करने का अवसर मिलेगा। फलतः वे गाँवों को छोड़ कारखाने वालों स्थानों या शहरों को जाने लगे।

          लेकिन वहाँ उनके लिए सुख सपना साबित हुआ । झुग्गी-झोपड़ी में रहकर उन्हें नरकीय जीवन बिताना पड़ा।

प्रश्न 3. स्लम पद्धति की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर-स्लम पद्धति की शुरुआत औद्योगीकरण से हुई। मजदूरों को छोटे-छोटे घरों में रहना पड़ा, जहाँ किसी प्रकार की सुविधा नहीं थी। स्त्री हो या पुरुष-सभी को खुले में शौच जाना पड़ता था।

        इस कारण गंदगी बढ़ने लगी और लोग तरह-तरह के रोगों का शिकार होने लगे। मजदूर अपने निवास के लिए अच्छी सुविधापूर्ण व्यवस्था करने में असमर्थ थे। कारण कि उन्हें इतनी कम आय होती थी, जिससे उनको दाने-दाने को मुँहताज रहना पड़ता था।

       आगे चलकर कुछ ट्रेड यूनियन बने, जिन्होंने उत्पादन से होने वाले की आय के उचित बँटवारे की बात उठाई। लेकिन ये यूनियन अपनी दुकानदारी चमकाने में अधिक रहते थे और मजदूरों को सुविधा दिलाने की ओर कम ध्यान देते थे।

4. न्यूनतम मजदूरी कानून कब पारित हुआ? इसके क्या उद्देश्य थे?

उत्तर- न्यूनतम मजदूरी कानून (Minimum Wages Act), 1949 में पारित किया गया। इसका उद्देश्य था कि मजदूरों की उनकी क्षमता के मुकाबले मजदूरी निश्चित हो जाय-ताकि कारखानेदार उनका शोषण नहीं करने पाएँ । इसके साथ ही उनके काम के घंटे भी निश्चित किए गए।

        न्यूनतम मजदूरी इतनी निश्चित की गई, जिससे मजदूर न केवल अपना, बल्कि अपने परिवार का भी पालन-पोषण कर सकें। इतना ही नहीं, इससे कुछ अधिकं भी हो, इसका भी ख्याल रखा गया ।

5. “कोयला एवं लौह उद्योग ने औद्योगीकरण को गति प्रदान की।”

उत्तर:- औद्योगीकरण के आरम्भ से ही कोयला और लोहा की आवश्यकता महसूस हुई। जितनी भी मशीने बनीं या जिनके बनने की कल्पना की गई वे सब लोहे से ही बन सकती थीं। लोहा को उसका वास्तविक रूप दे सकता था कोयला ।

          अतः इन दोनों खनिजों-कोयला और लोहा ने औद्योगीकरण को गति ही नहीं, स्थायीत्व भी प्रदान किया। पूँजीपति इन दोनों खनिजों का लाभ उठाकर विश्व को अनेक सुविधापूर्ण वस्तुएँ प्रदान तो की, लेकिन इन उद्योगों से पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गया। आज का वैश्विक तापमान उसी का परिणाम है।

अर्थव्यवस्था और आजीविका Long Question Answer 2022

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प्रश्न 1. औद्योगीकरण के कारणों का उल्लेख करें।

उत्तर:- औद्योगीकरण सर्वप्रथम इंगलैंड में ही हुआ। इसके कुछ कारण भी थे। एक कारण तो यह था कि वहाँ स्वतंत्र व्यापार (free trade) और अहस्तक्षेप की नीति (policy of lasissez faire) ।

       इन कारणों से ब्रिटेन में व्यापार की इतनी वृद्धि हुई कि व्यापारी धन-धान्य से भरपूर हो गए । व्यापार के विकसित होने से वस्तुओं की माँग बढ़ने लगी। लेकिन जिस ढाँचे में वे थे, उसमें वस्तुओं का उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था। सूत की कमी पड़ रही थी।

         सूत के अभाव में बुनकरों को बेकार समय बिताना पड़ता था। इसी कमी को पूरा करने के लिए सूत का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक था। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बिटेन में अनेक नई मशीनों के आविष्कार हुए।  1769 मे आर्क राइटने स्पिनिंग फ्रेम (spining frame) बनाया जो सूत कातने की मशीन थी और जल शक्ति से चलती थी।

          1770 में हारग्रीब्ज ने सूत कातने की स्पिनिंग जेनी (spinning jenny) नामक एक अन्य मशीन बनाई जो सोलह तकुए एक चक्के के घुमने से चलते थे। इन मशीनों के कारण सूत की कमी दूर हो गई। लेकिन शीघ्र ही 1773 में जॉन के ने फ्लाइंग शटल (fling shuttle) बना डाला,

            जिस पर तेजी से कपड़ा बुना जाने लगा। अब फिर सूत की कमी महसूस की जाने लगी। 1779 में सेम्यूल काम्पटन ने स्पिनिंग म्यूल (spinning mule) बना डाला, जिससे तेजी से और महीन सूत काता जा सकता था। 1779 ने कार्टराइट ने भाप से चलने वाला प्रावर लुम (power loom) नामक करघा बना डाला। इसी समय कपड़ा छापने की मशीन भी बन गई।

        टॉमस बेल की बेलनाकार छपाई (cylindrical printing) की मशीन ने सूती वस्त्रों की रंगाई एवं छपाई में नई क्रांति ला दी। इन्हीं आविष्कारों के चलते 1820 तक ब्रिटेन सूती वस्त्र उद्योग में काफी आगे निकल गया। इस स्थित को लाने में 1769 में जेम्स वाट द्वारा बनाए गए भाप इंजन ने काफी सहयोग दिया।

       वाष्प की मदद से रेल के ईंजन बनने लगे। कोयला खानों के मजदूरों के लिए 1815 में ही हैम्फ्री डेवी ने सेफ्टी लैम्प (safety lamp) का आविष्कार किया। 1815 में ही हेनरी बेसेमर ने ऐसी शक्तिशाली भट्ठी बनाई कि लोहा गलाना बहुत आसान हो गया।

प्रश्न 2. औद्योगीकरण के फलस्वरूप (परिणामस्वरूप) होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालें।

उत्तर:- औद्योगीकरण की सफलता से उत्पादन इतना बढ़ गया कि उन्हें बेचने के लिए बाजार की आवश्यकता थी। बाजार के साथ-साथ कच्चे माल भी आवश्यक ये दोनों आवश्यकताएँ एशिया और अफ्रीका के वे देश पूर्ण कर सकते थे।

          जहाँ यूरोपीय देशों के उपनिवेश थे। अब उपनिवेशों को बढ़ाने और उन्हें स्थिर करने की होड़-सी मच गई। ब्रिटेन ने भारत में अपने को और मजबूत किया। भारत के जिन क्षेत्रों पर वह अधिकार नहीं जमा सका उस क्षेत्र के शासकों से समझौता कर विभिन्न प्रावधानों द्वारा उन्हें अपनी मुट्ठी में ही रखा।

           ये राजे-रजवाड़े अंग्रेजों के अच्छे मददगार भी साबित हुए। अफ्रीका को लेकर यूरोपीयन देशों में सबसे अधिक होड़ थी। उस महादेश को लेकर युद्ध भी हुए और समझौते भी। समझौतों के अनुसार इन्होंने उसका बँटवारा इस प्रकार किया मानों इनकी बपौती जमीन हो।

        आप यदि अफ्रीका के मानचित्र देखें। तो पाएँगे कि सभी देशों की सीमाएँ पूर्णतः या लगभग सीधी-सीधी हैं। कच्चे माल की पहुँच कारखाना तक तथा तैयार माल को बाजार तक पहुँचाने के लिए सड़कों और रेलों का जाल बिछा दिया गया। न केवल अपने देश में, बल्कि उपनिवेश वाले देशों में भी। रेलवे स्टेशन से समुद्र तट तथा समुद्र तट से रेलवे स्टेशन को रेलों और सड़कों से जोड़ा गया। अब बड़े-बड़े समुद्री जहाज बने, 

         जिनकी सामान ढोने की क्षमता हमारी सोच से भी अधिक थी। वैसे यूरोपीय देश तो पहले से ही उपनिवेश स्थापना की ओर बढ़ चुके थे, लेकिन अब वे उसे फैलाने और स्थिर करने में तत्पर हो गए। इसी का परिणाम था प्रथम विश्व युद्ध, जो 1914 से 1918 तक चला।

3. उपनिवेशवाद से आप क्या समझते हैं? “औद्योगीकरण ने ज्यनिवेशवाद को जन्म दिया।” कैसे?

उत्तर:- अर्थव्यवस्था और आजीविका उपनिवेशवाद उस पद्धति को कहते हैं, जिनके तहत सैनिक शक्ति से सम्पन्न कोई देश किसी अन्य देश पर अपना कब्जा जमा कर वहाँ शासन करने लगता है। इसी पद्धति को उपनिवेशवाद कहते हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन द्वारा भारत पर अधिकार जमा लेना, फ्रांस का हिन्द चीन पर अधिकार जमा लेना आदि। प्रश्न में पूछा गया है।

          कि औद्योगकीरण ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया और कैसे? इस विषय में कहना पड़ेगा कि औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया, बल्कि उपनिवेशवाद ने औद्योगीकरण को जन्म दिया। कम-से-कम भारत के सन्दर्भ में तो यही सही है। भारत में अंग्रेजों ने पैर पहले जमाए और इंग्लैंड में औद्योगीकरण बाद में हुआ।

        एशियाई देशों के साथ-साथ अफ्रीकी देशों के विषय में भी यही कहना सही है। वास्तव में कहना चाहिए कि औद्योगीकरण की सफलता के बाद उपनिवेशों की छीना- झपटी और विस्तार आदि की घटनाएँ बढ़ने लगीं। जहाँ उपनिवेशवादी मजबूत थे, वहाँ उन्होंने अपने को और मजबूत किया और अपने विरोधियों को भगा दिया या उन्हें कमजोर करने में लगे रहे।

          जिन यूरोपीय देशों के पास बड़े उपनिवेश थे, वे तो उसकी मजबूती में लगे थे। और जिन देशों के पास छोटे उपनिवेश थे वे उसकी मजबूती और विस्तृतीकरण में लगे थे। जिसके पास कोई उपनिवेश नहीं था, वह उपनिवेश की चाहत में परेशान था। असल में यूरोप राष्ट्रवाद के मद में इतना अंधा हो चुका था कि जिस राष्ट्र के पास उपनिवेश नहीं था उसे हीन दृष्टि से देखा जाता था। बड़े-बड़े उपनिवेशवादी को आदर की दृष्टि से देखा जाता था।

       जिस राष्ट्र के पास उपनिवेश था तो लेकिन कम था। उन्हें सामान्य दृष्टि से देखा जाता था। प्रत्येक यूरोपीय देश उपनिवेशों को लेकर पागल बना हुआ था।

4. कुटीर उद्योग के महत्त्व एवं उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डालें।

उत्तर-:- अर्थव्यवस्था और आजीविका कुटीर उद्योग के महत्त्व अनेक बातों को लेकर है। ऐसे उद्योग देश के गाँव- गाँव में फैले रहते हैं। इसे स्थानीय लोग ही बनाते हैं और स्थानीय लोग ही खरीदते भी हैं। यदा-कदा मेले, बाजारों में भी ये सामान बिक जाते हैं। कारण कि सभी सामान सभी स्थानों पर नहीं बनते। एक स्थान की उत्पादित वस्तुएँ अन्य स्थान के लोगों को भी मेले में प्राप्त हो जाया करती है।

कुटीर उद्योगों के लिए जो कच्चा माल होते हैं, वे सब स्थानीय तौर पर ही प्राप्त हो जाते हैं। सबसे महत्त्व की बात है कि इसके लिए अधिक पूँजी की भी आवश्यकता नहीं होती। मजदूर या कारीगर भी नहीं रखने पड़ते, कारण कि सभी काम घर के लोग ही कर लेते हैं। घर में जितने लोग होते हैं, उतना ही सामान बनते हैं। तारीफ कि उन उत्पादित वस्तुओं को बेचने का काम भी घर के लोग ही कर लेते हैं।

कुटीर उद्योग के उत्पादन में घर के बूढ़े-जवान, स्त्री-पुरुष सभी बैठे- बैठे कुछ-न-कुछ काम कर देते है। कुटीर उद्योग की उपयोगिता है कि कुटीर उद्योग वाले लगभग उन्हीं वस्तुओं को तैयार करते हैं, जिनकी आवश्यकता स्थानीय लोगों को रहती है। मिट्टी के बर्तन, खुरपी, कुदाल या कृषि के औजार स्थानीय रूप में ही तैयार हो जाते थे और इन सभी वस्तुओं के ग्राहक भी स्थानीय किसान-मजदूर ही हुआ करते थे।

विवाह श्राद्ध से लेकर अनेक धार्मिक कृत्यों में मिट्टी के बर्तन की आवश्यकता होती है। कलश हो या दीपक, इसके लिए घी हो या तेल, सब स्थानीय रूप में ही उपलब्ध हो जाते थे। कारण कि इनके निर्माण या तैयार करने वाले स्थानीय लोग ही होते थे।

औद्योगीकरण और बाजारीकरण वाले आज के युग में भी स्थानीय कारीगरों की उपयोगिता पहले के तरह ही जैसी की तैसी बनी हुई है। खासकर भारत जैसे देश में, जहाँ के निवासियों का कोई भी काम बिना पूजा-पाठ के नहीं होता।

प्रश्न 5. ‘औद्योगीकरण ने सिर्फ आर्थिक ढाँचे को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग भी प्रशस्त किय।’ कैसे?

उत्तर:- अर्थव्यवस्था और आजीविका औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने उत्पादन होने शुरू हुए, जिनकी खपत के लिए यूरोप में उपनिवेशो की होड़ आरंभ हो गई। आगे चलकर उपनिवेशवाद ने साम्राज्यवाद का रूप ले लिया। उपनिवेशवाद में जहाँ एक ओर तकनीक रूप से उपनिवेश कमजोर थे,

किन्तु कच्चे माल से समृद्ध थे, पर आर्थिक नियंत्रण स्थापित करते- करते उनपर अपना शासन तक लाद दिया जाता था। वहीं दूसरी ओर साम्राज्यवादी देशों द्वारा आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह के नियंत्रण स्थापित किया जाता था। तात्पर्य कि दोनों ही स्थितियों में कमजोर देशों पर अपना आधिपत्य स्थापित करना था।

अपना आधिपत्य स्थापित करने की होड़ ने प्रथम विश्व युद्ध को जन्म दे दिया। इस युद्ध में सभी यूरोपीय देश तो परस्पर फँसे ही, एशियाई और अफ्रीकी देश में बचे नहीं रह सके। युद्ध की समाप्ति के बाद अफ्रीकी देशों में तो कुछ बदलाव आया ही, यूरोप का तो पूरा नक्शा ही बदल गया। युद्ध की समाप्ति के बाद आस्ट्रिया-हंगरी को बाँट दिया गया।

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